को रति है अरु कौन रमा उमा छूटी लटैँ निचुरैँ गुयीँ मोती । हाय अनूठे उरोज उठे भये मैन तुठे भये और है कोती । त्योँ कवि ग्वाल नदी तट न्हाय खड़ी लड़ी रूप की सुँदर जोती । मोरति अँग मरोरति भौँहनि चोरति चित्त निचोरति धोती ।