किस सम्त जा रहा है ज़माना न जाए उकता गए हैं लोग फ़साना कहा न जाए अपना मकाँ उजाड़ के सहराओं की तरफ वो शख़्स क्यूँ हुआ है रवाना कहा न जाए लम्हो की तरह गुज़री हैं सदियाँ तो बार-हा इक पल बना है ज़माना कहा न जाए शोले बने हैं लफ़्ज़ तो काँटा हुई ज़बाँ अब क्या करें जो तेरा फ़साना कहा न जाए है आँख उफ़ुक़ पे बर्फ़ की सूरत जीम हुई शब होगी कब सहर का निशाना कहा न जाए कहने को से ग़ज़ल है मगर क्या ग़ज़ल जिसे नौहा कहा न जाए तराना कहा न जाए