उदयाचल से किरन-धेनुएँ हाँक ला रहा वह प्रभात का ग्वाला। पूँछ उठाए चली आ रही क्षितिज जंगलों से टोली दिखा रहे पथ इस भूमा का सारस, सुना-सुना बोली गिरता जाता फेन मुखों से नभ में बादल बन तिरता किरन-धेनुओं का समूह यह आया अन्धकार चरता, नभ की आम्रछाँह में बैठा बजा रहा वंशी रखवाला। ग्वालिन-सी ले दूब मधुर वसुधा हँस-हँस कर गले मिली चमका अपने स्वर्ण सींग वे अब शैलों से उतर चलीं। बरस रहा आलोक-दूध है खेतों खलिहानों में जीवन की नव किरन फूटती मकई औ’ धानों में सरिताओं में सोम दुह रहा वह अहीर मतवाला।