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ख़ून की होली जो खेली - सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

युवकजनों की है जान ; ख़ून की होली जो खेली । पाया है लोगों में मान, ख़ून की होली जो खेली । रँग गये जैसे पलाश; कुसुम किंशुक के, सुहाए, कोकनद के पाए प्राण, ख़ून की होली जो खेली । निकले क्या कोंपल लाल, फाग की आग लगी है, फागुन की टेढ़ी तान, ख़ून की होली
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