खुदा जाने कहाँ है 'असग़र'-ए- दीवाना बरसों से कि उस को ढूँढते हैं काबा-ओ-बुतखाना बरसों से तड़पना है न जलना है न जलकर ख़ाक होना है ये क्यों सोई हुई है फ़ितरत-ए-परवाना बरसों से कोई ऐसा नहीं यारब कि जो इस दर्द को समझे नहीं मालूम क्यों ख़ामोश है दीवाना बरसों से हसीनों पर न रंग आया न फूलों में बहार आई नहीं आया जो लब पर नग़मा-ए-मस्ताना बरसों से