हिम, केवल हिम- अपने शिवःरूप में हिम ही हिम अब! रग-गंध सब पिरत्याग कर भोजपत्रवत हिमाच्छादित वनस्पित से हीन धरित्री- स्वयं तपस्या। पता नहीं किस इतिहास-प्रतीक्षा में यहाँ शताब्िदयाँ भी लेटी हैं हिम थुल़्मों में। शिवा की गौर-प्रलम्ब भुजाआें सी पवर्त-मालाएँ नभ के नील पटल पर पृथिवी-सूक्त लिख रहीं। नीलमवणीर् नभ के इस बर्ह्माण्ड-सिन्धु में हिम का राशिभूत यह ज्वार शिखर, प्रतिशखर गगनाकुल। याक सरीखे धमर्वृषभ इस हिम प्रदेश में