कामरान यूँ था मेरा बख़्त-ए-जवां कल रात को झुक रहा था मेरे दर पे आसमां कल रात को [कामरान=सफल; बख़्त=किस्मत] हुस्न जब था इश्क़ के घर मेहमां कल रात को उठ चुका था हर हिजाब-ए-दरमियाँ कल रात को [मेहमां=अतिथि; हिजाब=परदा; दरमियाँ=इन बीच में] काश बन जाती हयात-ए-जाविदां कल रात को किस क़दर महबूब थी उम्र-ए-रवाँ कल रात को दिल अगर तन्हा मेरा तीर-ओ-कमाँ की ज़द पे था दिल की ज़द पर भी रहे तीर-ओ-कमाँ कल रात को [ ज़द=निशाना] बन रही थी हल्क़ा मेरी ज़ीस्त के गिर्दाब का कुछ सुनहरी कुछ रुपहली चूड़ियाँ कल रात को रुक गईं थी यूँ ज़मीं-ओ-आसमां की गर्दिशें नीम-शब पर शाम ही का था गुमाँ कल रात को [ नीम-शब=आधी रात] क्या खबर क्यों हुस्न की फ़रमाइशों के बावजूद इश्क़ ने छेडी न अपनी दास्ताँ कल रात को