
ले लो कर्म-क्लांत यह जीवन, ले लो जप, तप, व्रत, साधन;
बन जाने दो जग की पद-रज मेरा गौरव, मेरा धन।
खो जाने दो मुझे विश्व के सुख-दुख के कोलाहल में;
मूक उपेक्षा के आँगन में, विस्मृति के तम-अंचल में।
सब कुछ ले लो, मुझे बना दो ‘रंको का राजा’, स्वामी!
पर, मनुहार माननी होगी इतनी-सी, अंतर्यामी!
जब भ
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