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कलाकार का स्वर्ग - जगन्नाथप्रसाद 'मिलिंद'

ले लो कर्म-क्लांत यह जीवन, ले लो जप, तप, व्रत, साधन; बन जाने दो जग की पद-रज मेरा गौरव, मेरा धन। खो जाने दो मुझे विश्व के सुख-दुख के कोलाहल में; मूक उपेक्षा के आँगन में, विस्मृति के तम-अंचल में। सब कुछ ले लो, मुझे बना दो ‘रंको का राजा’, स्वामी! पर, मनुहार माननी होगी इतनी-सी, अंतर्यामी! जब भ
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