ले लो कर्म-क्लांत यह जीवन, ले लो जप, तप, व्रत, साधन; बन जाने दो जग की पद-रज मेरा गौरव, मेरा धन। खो जाने दो मुझे विश्व के सुख-दुख के कोलाहल में; मूक उपेक्षा के आँगन में, विस्मृति के तम-अंचल में। सब कुछ ले लो, मुझे बना दो ‘रंको का राजा’, स्वामी! पर, मनुहार माननी होगी इतनी-सी, अंतर्यामी! जब भावना-तूलिका मेरी, डूब उषा के सोने में, अनुभव की तस्वीर उतारे, अन्तर-पट के कोने में, अपनी ही उस सफल सृष्टि पर चढ़ा शेष आँसू दो-चार, अर्पण-मद में वारे अपना, मुग्ध हृदय, अंतिम आधार; त्याग-तृप्ति का वह असीम सुख अविचल सह लेने देना, उस सौंदर्य-स्वर्ग में मुझ को क्षण भर रह लेने देना।