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कब तक यूं बहारों में पतझड़ का चलन होगा

कब तक यूं बहारों में पतझड़ का चलन होगा? कलियों की चिता होगी, फूलों का हवन होगा हर धर्म की रामायण युग-युग से ये कहती है सोने का हरिण लोगे, सीता का हरण होगा जब प्यार किसी दिल का पूजा में बदल जाए हर पल आरती होगी, हर शब्द भजन होगा जीने की कला हम ने सीखी है शहीदों से होठों पे ग़ज़ल होगी जब सिर पे कफन होगा इस रूप की बस्ती में क्या माल खरीदोगे? पत्थर के हृदय होंगे, फूलों का बदन होगा यमुना के किनारे पर जो दीप भी जलता है वो और नही कुछ भी, राधा का नयन होगा जीवन के अँधेरे में हिम्मत न कभी हारो
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