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कब इस से क़ब्ल नज़र में गुल-ए-मलाल खिला - समीना राजा

कब इस से क़ब्ल नज़र में गुल-ए-मलाल खिला

किसी की याद में लेकिन ये अब के साल खिला

अजीब आब-ओ-हवा थी अजीब थी मिट्टी

सो दिल के गोशे में इक फूल बे-मिसाल खिला

मैं छू के देख रही थी कि सब्ज़ा-ए-रुख़ पर

गुलाब-ए-सुर्ख़ की सूरत तिरा जमाल खिला

मैं दम-ब-ख़ुद ही रही और शीशा-ए-जाँ पर

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