कब इस में शक मुझे है जो लज़्ज़त है क़ाल में
लेकिन वो बात इस में कहाँ है जो हाल में
दिल है मेरा के मारका-ए-कुफ़्र-ओ-दीं कोई
इक उम्र कट गई है जवाब ओ सवाल में
अल्लाह रे बे-ख़ुदी के तेरे घर के आस-पास
हर दर पे दी सदा तेरे दर के ख़याल में
दो नाम एक कैफ़ियत-ए-जज़्ब-ए-दिल के हैं
बस फ़र्क़ इस क़दर है फ़िराक़ ओ विसाल में
आए वो कितनी बार निगाहों के रू-ब-रू
उस के लिबास में कभी उस के जमाल में