जो पर के अवगुण लखै, अपने राखै गूढ़ । सो भगवत के चोर हैं, मंदमति जड़ मूढ़ ।। मंदमति जड़ मूढ़ करें, निंदा जो पर की । बाहर भरमते फिरें डगर भूले निज घर की ।। गंगादास बेगुरु पते पाये ना घर के । ओ पगले हैं आप पाप देखें जो पर के ।।