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जो कुटिलता से जियेंगे - बालकवि बैरागी

छीनकर छ्लछंद से हक पराया मारकर अम्रित पिया तो क्या पिया ? हो गये बेशक अमर जी रहे अम्रित उमर लेकिन अभय अनमोल सारा छिन गया । देवता तो हो गये पर क्या हुआ देवत्व का ? आयुभर चिन्ता करो अब पद प्रतिष्टा,राजसत्ता और अपने लोक की ! छिन नहीं जाए सुधा सिंहासनों की एक हि भय रात दिन आठों प्रहर प्राण में बैठा रहे-- इस भयातुर अमर जीवन का करो क्या ? जो किसि षड्यंत्र मे छलछंद में शामिल नहीं था पी गया सारा हलाहल
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