जो बात मेरे कान में ख़्वाबो ने कही है वो बात हमेशा ही ग़लत हो के रही है । जो चाहो लिखो नाम मेरे सब है मुनासिब उनकी ही अदालत है यहाँ, जिनकी बही है । टपका जो लहू पाँव से मेरे तो वो चीख़े कल जेल से भागा था जो मुजरिम वो वही है । वो चाहे मेरी जीभ मेरे हाथ पर रख दे मैं फिर भी कहूँगा कि सही बात सही है । इक दोस्त से मिलने के लिए कब से खड़ा हूँ कूचा भी वही, घर भी वही, दर भी वही है । उम्मीद की जिस छत के तले राही रुका मैं वो छत ही क़यामत की तरह सिर पे ढही है ।