
ज्ञान ध्यान कुछ काम न आए
हम तो जीवन-भर अकुलाए ।
पथ निहारते दृग पथराए
हर आहट पर मन भरमाए ।
झूठे जग में सच्चे सुख की
क्या तो कोई आस लगाए ।
देवालय हो या मदिरालय
जहाँ गए जाकर पछताए ।
तड़क-भड़क संतो की ऐसी
दुनियादार देख शरमाए ।
माल लूट का सबने बाँटा
हम ही पड़े रहें अलसाए ।
जो बिक जाता धन्य वही है
जो न
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