ज्ञान ध्यान कुछ काम न आए हम तो जीवन-भर अकुलाए । पथ निहारते दृग पथराए हर आहट पर मन भरमाए । झूठे जग में सच्चे सुख की क्या तो कोई आस लगाए । देवालय हो या मदिरालय जहाँ गए जाकर पछताए । तड़क-भड़क संतो की ऐसी दुनियादार देख शरमाए । माल लूट का सबने बाँटा हम ही पड़े रहें अलसाए । जो बिक जाता धन्य वही है जो न बिके मूरख कहलाए । टिकट बाँटने के नाटक में धूर्त महानायक बन छाए । शिष्टाचार भ्रष्टता दोनों— ने अपने सब द्वैत मिटाए । जहाँ बिछी शतरंज वही ही शातिर बैठे जाल बिछाए । अब के यूँ खैरात बँटी है सारा किस्सा दिल बहलाए । दुर्जन पार लगाता नैया सज्जन किसका काम बनाए । राही तो सीधे-सादे है कौन भला क्या उनसे पाए ।