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जीवन, यह मौलिक महमानी - माखनलाल चतुर्वेदी

जीवन, यह मौलिक महमानी! खट्टा, मीठा, कटुक, केसला कितने रस, कैसी गुण-खानी हर अनुभूति अतृप्ति-दान में बन जाती है आँधी-पानी कितना दे देते हो दानी जीवन की बैठक में, कितने भरे इरादे दायें-बायें तानें रुकती नहीं भले ही मिन्नत करें कि सौहे खायें! रागों पर चढ़ता है पानी।। जीवन, यह मौलिक महमानी।।
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