जी रहे हैं लोग कैसे आज के वातावरण में नींद में दु:स्वप्न आते, भय सताता जागरण में बेशरम जब आँख हो तो सिर्फ घूंघट क्या करेगा आदमी नंगा खड़ा है सभ्यता के आवरण में घोर कलियुग है कि दोनों राम-रावण एक-से हैं लक्ष्मणों का हाथ रहता आजकल सीता-हरण में शब्द नारे बन चुके हैं, अर्थ घोर अनर्थ करते 'संधि' कम 'विग्रह' अधिक है जिन्दगी के व्याकरण में दंभ के माथे मुकुट है, साधना की माँग सूनी कोयलें सिर धुन रही हैं, बैठ कौवों की शरण में आधुनिक युगबोध ने साहित्य का है रूप बदला गद्य केवल छप रहा है, गीत के हर संस्करण में रात ने निर्धन समय को हाय ! रिश्वत तो नहीं दी झांकता है क्यों अंधेरा सूर्य की पहली किरण में जल रहे ईर्ष्या से जुगनू देख यौवन चाँदनी का ढूंढते हैं दोष बगुले हंस के हर आचरण में