जी ही जी में वो जल रही होगी चाँदनी में टहल रहीं होगी चाँद ने तान ली है चादर-ए-अब्र अब वो कपड़े बदल रही होगी सो गई होगी वो शफ़क़ अन्दाम सब्ज़ किन्दील जल रही होगी सुर्ख और सब्ज़ वादियों की तरफ वो मेरे साथ चल रही होगी चढ़ते-चढ़ते किसी पहाड़ी पर अब तो करवट बदल रही होगी नील को झील नाक तक पहने सन्दली जिस्म मल रही होगी