झर झर झाँपै बड़े दर दर ढ़ाँपै नापै , तऊ काँपै थर थर बाजत बतीसी जाय । फेरि पसमीनन के चौहरे गलीचन पै , मखमली सौरि आछी सोऊ सरदी सी जाय । ग्वाल कवि कहै मृग मद के धुकाये धूम , ओढ़ि ओढ़ि छार भार आग हू छपी सी जाय । छाकै सुरा सीसाहू न सीसी पै मिटैगी कभू , जौँ लौ उकसी सी छाती छाती सो न मीसी जाय ।