जावक के भार पग धरा पै मंद, गंध भार कचन परी हैं छूटि अलकैं। द्विजदेव तैसियै विचित्र बरूनी के भार, आधे-आदे दृगन परी हैं अध पलकैं॥ ऐसी छबि देखी अंग-अंग की अपार, बार-बार लोल लोचन सु कौन के न ललकैं। पानिप के भारन संभारति न गात लंक, लचि-लचि जात कुच भारन के हलकैं॥