मैं भी मरूंगा और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे लेकिन मैं चाहता हूं कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें फिर भारत भाग्य विधाता मरें फिर साधू के काका मरें यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें फिर मैं मरूं- आराम से उधर चल कर वसंत ऋतु में जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है या फिर तब जब महुवा चूने लगता है या फिर तब जब वनबेला फूलती है नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके और मित्र सब करें दिल्लगी कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा॥