निरखो नयान ज्ञान के खोल, प्रभु की ज्योति जगमगाती है। देखो, दमक रही सब ठौर, चमके नहीं कहीं कुछ और, प्यारी हमस ब की सिरमौर, उज्ज्वल अंकुर उपजाती है। जिसने त्यागे विषय-विकार, मन में धारे विमल विचार, समझा सदुपदेश का सार, उस को महिमा दरसाती है। जिसको किया कुमति ने अन्ध, बिगड़ा जीवन का सुप्रबन्ध, कुछ भी रहा न तप का गन्ध, झलके, पर न उसे पाती है। जिसने झंझट की झर झेल, परखे जड़-चेतन के खेल, अपना किया निरन्तर मेल, ‘शंकर’ उसको अपनाती है।