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जब अपने नग़मे न अपनी ज़बाँ तक आए - जगन्नाथ आज़ाद

जब अपने नग़मे न अपनी ज़बाँ तक आए तेरे हुज़ूर हम आ कर बहुत ही पछताए ख़याल बन न सका नग़मा गरचे हम ने उसे हज़ार तरह के मलबूस-ए-लफ़्ज़ पहनाए ये हुस्न-ओ-रंग का तूफ़ाँ है मआज़-अल्लाह निग
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