तुम कहते हो - मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है | मैं कहती हूँ - इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है || सच कहती हूँ, इस रोने की छवि को जरा निहारोगे | बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदों पर मुक्तावली वारोगे || 1 || ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो | यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो || कैसी करुणा-जनक दृष्टि है, हृदय उमड़ कर आया है | छिपे हुए आत्मीय भाव को यह उभार कर लाया है || 2 || हँसी बाहरी, चहल-पहल को ही बहुधा दरसाती है | पर रोने में अंतर तम तक की हलचल मच जाती है || जिससे सोई हुई आत्मा जागती है, अकुलाती है | छुटे हुए किसी साथी को अपने पास बुलाती है || 3 || मैं सुनती हूँ कोई मेरा मुझको अहा ! बुलाता है | जिसकी करुणापूर्ण चीख से मेरा केवल नाता है || मेरे ऊपर वह निर्भर है खाने, पीने, सोने में | जीवन की प्रत्येक क्रिया में, हँसने में ज्यों रोने में || 4 || मैं हूँ उसकी प्रकृति संगिनी उसकी जन्म-प्रदाता हूँ | वह मेरी प्यारी बिटिया है मैं ही उसकी प्यारी माता हूँ || तुमको सुन कर चिढ़ आती है मुझ को होता है अभिमान | जैसे भक्तों की पुकार सुन गर्वित होते हैं भगवान