इस ज़िंदगी को यदि पुनः जीया जा सके — तो शायद सुखद अनुभूतियों के फूल खिल जाएँ! हृदय को राग के उपहार मिल जाएँ! आत्मा में मनोरम कामनाओं की सुहानी गंध बस जाए दूर कर अंतर / परायापन कि सब हो एकरस जाएँ! किंतु क्या संभव पृथक होना अतीत-व्यतीत से, इतिहास के अभिलेख से, पूर्व-अंकित रेख से?