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इस अकाल बेला में - राजकमल चौधरी

होश की तीसरी दहलीज़ थी वो हाँ ! तीसरी ही तो थी, जब तुम्हारी मुक्ति का प्रसंग कुलबुलाया था पहली बार मेरे भीतर अपनी तमाम तिलमिलाहट लिए दहकते लावे-सा पैवस्त होता हुआ वज़ूद की तलहट्टियों में फिर कहाँ लाँघ पाया हूँ कोई और दहलीज़ होश की... सुना है, ज़िन्दगी भर चलती ज़िन्दगी में आती हैं आठ दहलीज़ें होश की तुम्हारे "मुक्ति-प्रसंग" के उन आठ प्रसंगों की भाँति ही सच कहूँ, जुड़ तो गया था तुमसे पहली दहलीज़ पर ही अपने होश की, जाना था जब कि दो बेटियों के बाद उकतायी माँ गई थी कोबला माँगने एक बेटे की खातिर उग्रतारा के द्वारे... ...कैसा संयोग था वो विचित्र ! विचित्र ही तो था कि
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