घर मे कौन है पता नही रिश्ते ये जानते ही नही बाहरी दुनिया अपनी लागे ऊँचे लोगों से नाते गाँठे दिल को भुनाये पैसों से पैसों से ही अपनापन बाँटे सोच है ये कि बिकता सब चाहे दिल हो या ऊँचा पद दूजे को पूछे न पल भर अपनी अपनी ही बाते हाँके इनको ये समझाये कौन प्रेम की भाषा है बस मौन एक दिन सब छूट जायेगा अपना घर ही मन भायेगा दुनिया वाले जब करेंगे घात नज़र आयेंगे सब अपने जात आईना इक दिन बतलायेगा ख़ुद का चेहरा भी नज़रें चुरायेगा