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इक महक सी दम-ए-तहरीर कहाँ से आई - शानुल हक़ हक़्क़ी

इक महक सी दम-ए-तहरीर कहाँ से आई

नाम में तेरे ये तासीर कहाँ से आई

पहलू-ए-साज़ से इक मौज-ए-हवा गुज़री थी

ये छनकती हुई ज़ंजीर कहाँ से आई

दम हमारा तो रहा हल्क़ा-ए-लब ही में असीर

बू-ए-गुल ये तिरी तक़दीर कहाँ से आई

अहल-ए-हिम्मत के मिटाने से तो फ़ारिग़ हो ले

दहर को फ़ुर्सत-ए-तामीर कहाँ से आई

गो तरसता है अभी तक तिरी तहरीर को दिल

फिर भी

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