
इक महक सी दम-ए-तहरीर कहाँ से आई
नाम में तेरे ये तासीर कहाँ से आई
पहलू-ए-साज़ से इक मौज-ए-हवा गुज़री थी
ये छनकती हुई ज़ंजीर कहाँ से आई
दम हमारा तो रहा हल्क़ा-ए-लब ही में असीर
बू-ए-गुल ये तिरी तक़दीर कहाँ से आई
अहल-ए-हिम्मत के मिटाने से तो फ़ारिग़ हो ले
दहर को फ़ुर्सत-ए-तामीर कहाँ से आई
गो तरसता है अभी तक तिरी तहरीर को दिल
फिर भी
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