हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों - रामधारी सिंह "दिनकर"'s image
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हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों - रामधारी सिंह "दिनकर"

कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियो। श्रवण खोलो¸ रूक सुनो¸ विकल यह नाद कहां से आता है। है आग लगी या कहीं लुटेरे लूट रहे? वह कौन दूर पर गांवों में चिल्लाता है? जनता की छाती भिदें और तुम नींद करो¸ अपने भर तो यह जुल्म नहीं होने दूँगा। तुम बुरा कहो या भला¸ मुझे परवाह नहीं¸ पर दोपहरी में तुम्हें नहीं सोने दूँगा।।
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