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हिमालय और हम - गोपाल सिंह नेपाली

गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है । इतनी ऊँची इसकी चोटी कि सकल धरती का ताज यही । पर्वत-पहाड़ से भरी धरा पर केवल पर्वतराज यही ।। अंबर में सिर, पाताल चरण मन इसका गंगा का बचपन तन वरण-वरण मुख निरावरण इसकी छाया में जो भी है, वह मस्‍तक नहीं झुकाता है । ग‍िरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।। अरूणोदय की पहली लाली इसको ही चूम निखर जाती । फिर संध्‍या की अंतिम लाली इस पर ही झूम बिखर जाती ।। इन शिखरों की माया ऐसी जैसे प्रभात, संध्‍या वैसी अमरों को फिर चिंता कैसी ? इस धरती का हर लाल खुशी से उदय-अस्‍त अपनाता है । गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है ।। हर संध्‍या को इसकी छाया सागर-सी लंबी होती है । हर सुबह वही फिर गंगा की चादर-सी लंबी होती है ।। इसकी
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