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हर्फ़ों का दिल काँप रहा है लफ़्ज़ों की दीवार के पीछे - कँवल ज़ियाई

हर्फ़ों का दिल काँप रहा है लफ़्ज़ों की दीवार के पीछे

किस क़ातिल का नाम लिखा है लफ़्ज़ों की दीवार के पीछे

ख़ून से जलता एक दिया है लफ़्ज़ों की दीवार के पीछे

आज भी कितनी गर्म हवा है लफ़्ज़ों की दीवार के पीछे

करवट ले कर एक क़यामत जागने वाली है अब शायद

कहने को इक सन्नाटा है लफ़्ज़ों की दीवार के पीछे

सहमा सहमा खोया खोया कब से बैठा सोचा रहा हूँ

किस

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