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हर इक दरवेश का क़िस्सा अलग है - रसा चुग़ताई

हर इक दरवेश का क़िस्सा अलग है

मगर तर्ज़-ए-बयाँ अपना अलग है

ग़नीमत है बहम मिल बैठना भी

अगरचे वस्ल का लम्हा अलग है

मिले थे कब जो हम अब फिर

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