
हर इक दरवेश का क़िस्सा अलग है
मगर तर्ज़-ए-बयाँ अपना अलग है
ग़नीमत है बहम मिल बैठना भी
अगरचे वस्ल का लम्हा अलग है
मिले थे कब जो हम अब फिर Read More! Earn More! Learn More!

हर इक दरवेश का क़िस्सा अलग है
मगर तर्ज़-ए-बयाँ अपना अलग है
ग़नीमत है बहम मिल बैठना भी
अगरचे वस्ल का लम्हा अलग है
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