हम तो पिंजरों को परों पर रात-दिन ढोते नहीं,
आदमी हैं -हम किसी के पालतू तोते नहीं ।
क्यों मेरी आँखों में आँसू आ रहे हैं आपके
आप तो कहते थे कि पत्थर कभी रोते नहीं।
आप सर पर हाथ रखकर खा रहे हैं क्यों कसम,
जिनके दामन पाक हों वो दाग को धोते नहीं।
ख्वाब की चादर पे इतनी सिलवटें पड़ती नहीं,
हम जो सूरज के निकलने तक तुम्हें खोते नहीं।
दिल के बटवारे से बन जातीं हैं घर में सरहदें,
कि सरहदों से दिल के बटवारे कभी होते नहीं।
क्यों अँधेरों की उठाये घूमते हो जूतियाँ,
क्यों चिरागों को जलाकर चैन से सोते नहीं।
हम तो पिंजरों को परों पर रात-दिन ढोते नहीं,
आदमी हैं -हम किसी के पालतू तोते नहीं ।