
हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं
ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं
है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़
लोग नाहक़ ख़राब होते हैं
क्या कहें कैसे रोज़ ओ शब हम से
अमल-ए-ना-सवाब होते हैं
बादशह हैं गदा, गदा सुल्तान
कुछ नए इंक़लाब होते हैं
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हम जो मस्त-ए-शराब होते हैं
ज़र्रे से आफ़्ताब होते हैं
है ख़राबात सोहबत-ए-वाइज़
लोग नाहक़ ख़राब होते हैं
क्या कहें कैसे रोज़ ओ शब हम से
अमल-ए-ना-सवाब होते हैं
बादशह हैं गदा, गदा सुल्तान
कुछ नए इंक़लाब होते हैं