हाँ माना की थोड़ी अल्हड़ नदी सी हूँ मै,
बरसात के तेज में आकर उफान पर होती हूँ
कभी सर्द रातो में कल कल बहतीं हूँ,
हाँ माना की ढंग नहीं, सलीका नहीं,
कभी कभी सीमा भी लाँघ जाती हूँ मै,
पर जब जिस परिवेश में जाती हूँ
उसमे ढल सी जाती हूँ मै,
देखती हूँ जब अपनी छवि बिगड़ते हुए -
तो गम में सूख सी जाती हूँ मै
और पूजने पर ख़ुशी के गोते भी लगाती हूँ,
हाँ अल्हड़ बेपरवाह नदी सी हूँ मै


