ग्रीषम की पीर के विदीर के सुनो ये साज, तरु-गिरि तीर के, सुछाया में गंभीर के । सीतल समीर के सुगंधी गौन धीर के जे, सीर के करैया प्यासे पूरित पटीर के ॥ ग्वाल कवि गोरी दृग-तीर के, तुसीर के सु, मोद मिलें जैसें अकसीर के, खमीर के । आबखोरे छीर के, जमाये बर्फ चीर के, सु बंगले उसीर के, भिजे गुलाब-नीर के ॥