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घाव हरे कोई सहला गया - जयप्रकाश त्रिपाठी

आज सुबह आया था, रहा शाम तक, वह भी चला गया एक दिवस और। टुकर-टुकर ताकता रहा क्षितिज, सूरज फिर छला गया एक दिवस और । आँगन-आँगन कितना रोशन था, ख़शियाँ थीं आसमान तक, छमक-छमक नाचती हवाएँ थीं पूरब से पश्चिम की तान तक, मुआ वक़्त कल-परसो की तरह उम्मीदें सारी झुठला गया एक दिवस और देखा दि
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