
आज सुबह
आया था, रहा शाम तक,
वह भी
चला गया एक दिवस और।
टुकर-टुकर
ताकता रहा क्षितिज,
सूरज
फिर
छला गया
एक दिवस और ।
आँगन-आँगन
कितना रोशन था,
ख़शियाँ थीं
आसमान तक,
छमक-छमक
नाचती हवाएँ थीं
पूरब से
पश्चिम की तान तक,
मुआ वक़्त
कल-परसो की तरह
उम्मीदें
सारी झुठला गया
एक
दिवस और
देखा
दि
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