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गर्ल्स कॉलेज की लारी - जाँ निसार अख़्तर

फ़ज़ाओं में है सुब्ह का रंग तारी

गई है अभी गर्ल्स कॉलेज की लारी

गई है अभी गूँजती गुनगुनाती

ज़माने की रफ़्तार का राग गाती

लचकती हुई सी छलकती हुई सी

बहकती हुई सी महकती हुई सी

वो सड़कों पे फूलों की धारी सी बनती

इधर से उधर से हसीनों को चुनती

झलकते वो शीशों में शादाब चेहरे

वो कलियाँ सी खुलती हुई मुँह अंधेरे

वो माथे पे साड़ी के रंगीं किनारे

सहर से निकलती शफ़क़ के इशारे

किसी की अदा से अयाँ ख़ुश-मज़ाक़ी

किसी की निगाहों में कुछ नींद बाक़ी

किसी की नज़र में मोहब्बत के दोहे

सखी री ये जीवन पिया बिन सोहे

ये खिड़की का रंगीन शीशा गिराए

वो शीशे से रंगीन चेहरा मिलाए

ये चलती ज़मीं पे निगाहें जमाती

वो होंटों

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