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गंगा स्तुति - कमलानंद सिंह 'साहित्य सरोज'

मायामोहिनी के बस भांवरी भरत ताहि मुक्ति दै के भवर बनाया निज अंग है। नीचताइ नीचन सों वेग उदवेगन सों खल चितकार धुनि कलकल संग है॥
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