देश में जिधर भी जाता हूँ, उधर ही एक आह्वान सुनता हूँ "जड़ता को तोड़ने के लिए भूकम्प लाओ । घुप्प अँधेरे में फिर अपनी मशाल जलाओ । पूरे पहाड़ हथेली पर उठाकर पवनकुमार के समान तरजो । कोई तूफ़ान उठाने को कवि, गरजो, गरजो, गरजो !" सोचता हूँ, मैं कब गरजा था ? जिसे लोग मेरा गर्जन समझते हैं, वह असल में गाँधी का था, उस गाँधी का था, जिस ने हमें जन्म दिया था । तब भी हम ने गाँधी के तूफ़ान को ही देखा, गाँधी को नहीं । वे तूफ़ान और गर्जन के पीछे बसते थे । सच तो यह है कि अपनी लीला में तूफ़ान और गर्जन को शामिल होते देख वे हँसते थे । तूफ़ान मोटी नहीं, महीन आवाज़ से उठता है । वह आवाज़ जो मोम के दीप के समान एकान्त में जलती है, और बाज नहीं, कबूतर के चाल से चलती है । गाँधी तूफ़ान के पिता और बाजों के भी बाज थे । क्योंकि वे नीरवताकी आवाज थे।