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एक तिनका - अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

मैं घमण्डों में भरा ऐंठा हुआ । एक दिन जब था मुण्डेरे पर खड़ा । आ अचानक दूर से उड़ता हुआ । एक तिनका आँख में मेरी पड़ा मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा । लाल होकर आँख भी दुखने लगी ।
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