एक साग़र भी इनायत न हुआ याद रहे, साक़िया जाते हैं, महफ़िल तेरी आबाद रहे। बाग़बाँ दिल से वतन को ये दुआ देता है, मैं रहूँ या न रहूँ ये चमन आबाद रहे। मुझको मिल जाय चहकने के लिए शाख़ मेरी, कौन कहता है कि गुलशन में न सय्याद रहे। बाग़ में लेके जनम हमने असीरी झेली, हमसे अच्छे रहे जंगल में जो आज़ाद रहे।