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एक मुलाक़ात - साहिर लुधियानवी

तिरी तड़प से न तड़पा था मेरा दिल,लेकिन तिरे सुकून  से बेचैन हो गया हूँ मैं ये जान कर तुझे जाने कितना ग़म पहुचें कि आज तेरे ख़यालों में खो गया हूँ मैं किसी की हो के तू इस तरह मेरे घर आई कि जैसे फिर कभी आए तो घर मिले न मिले नज़र उठाई, मगर ऐसी बे-यकीनी  से कि जिस तरह कोई पेशे-नज़र  मिले न मिले तू मुस्कुराई, मगर मुस्
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