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एक बून्द - अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी, सोचने फिर-फिर यही जी में लगी हाय क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी। मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में, चू पड़ूँगी या कमल के फूल में। बह गई उस काल एक ऐसी हव
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