दुनिया में यूँ तो हर किसी का साथ-संग मिला अफ़सोस सब के चेहरे पे एक ज़र्द रंग मिला मज़हब की रौशनी से था रौशन हुआ जहाँ मज़हब के मसीहाओं से पर शहर तंग मिला सच की उड़ान जिसने भरी और उड़ चला वो शख़्स शहादत की लिए इक उमंग मिला कल तक गले लगा के जो करता था जाँ निसार बातों में उसकी आज अनोखा या ढंग मिला जिसने लिबास ओढ़ रखा था उसूल का वो फर्द सियात की उड़ाता पतंग मिला सूली पे चढ़ गया कोई हक़ बोलकर यहाँ तारिख़ के पन्नों पे इक ऐसा प्रसंग मिला शीशे में शक्ल देख हैराँ हुआ हूँ मैं शीशा भी मुझे देखकर किस कद्र दंग मिला मज़नू जहाँ गया वहाँ इक भीड़ थी जमा हाथों में सबके एक नुकीला सा संग मिला मिलकर चले थे सबके कदम सहर की तरफ क्यों आज विरासत में ये मैदाने जंग मिला