दोसत ग़मखवारी में मेरी सअयी फ़रमायेंगे क्या ज़ख़्म के भरते तलक नाखुन न बढ़ जाएंगे क्या बेन्याजी हद से गुज़री, बन्दा-परवर कब तलक हम कहेंगे हाले-दिल और आप फरमायेंगे क्या ? हज़रते-नासेह गर आएं दीदा-औ-दिल फरशे-राह कोई मुझको यह तो समझा दो समझायेंगे क्या आज वां तेग़ो-कफ़न बांधे हुए जाता हूं मैं उजर मेरे कतल करने में वो अब लायेंगे क्या गर कीया नासेह ने हमको कैद अच्छा ! यूं सही ये जुनेने-इशक के अन्दाज़ छूट जायेंगे क्या ख़ाना-ज़ादे-ज़ुल्फ़ हैं, जंज़ीर से भागेंगे कयों हैं गिरिफ़तारे-वफ़ा, जिन्दां से घबरायेंगे क्या है अब इस माअमूरा में कहते (कहरे)-ग़मे-उलफ़त 'असद' हमने यह माना कि दिल्ली में रहें खायेंगे क्या (नोट=कई जगह 'भरते तलक' की जगह 'भरने तलक' भी लिखा मिलता है)