पपीते की तरह हैं दिन पके हुए । पहले की तरह नहीं धूप नाचती, मैले कपड़े-लत्ते हवा काँचती, नज़र नहीं आते भौंरे थके हुए । अंबिया ने शुरू किया अभी झाँकना, पत्तों को है पसन्द गप्प हाँकना, ताल-तलैया पुरइन से ढँके हुए । आँखों में अभी कहाँ चढ़ी खुमारी, मेड़ों पे यात्राएँ फिर भी जारी, अधरों पर गीत, गंध में छके हुए ।