दिलों से आरज़ू-ए-उम्र-ए-जावेदाँ गई

कोई निगाह पस-ए-गर्द-ए-कारवाँ गई

वो और चीज़ है होते हैं जिस से दिल शादाब

तिरी बहार से वीरानी-ए-ख़िज़ाँ गई

निकल के ख़ुल्द से भी आदमी पछताया

ज़मीं पे भी चमन-आराई-ए-गुमाँ गई

बस एक कुंज-ए-क़फ़स तक सकी वर्ना

सबा चली तो चमन में कहाँ कहाँ गई

कहाँ कहाँ हुईं सब्त हुस्न की मोहरें

कली हवा में बिखर कर भी राएगाँ गई

मिरी दुआ की ये ग़ैरत है कितनी क़ाबिल-ए-दाद

कि लब तक आई मगर सू-ए-आसमाँ गई

दयार-ए-इश्क़ खंडर और दश्त-ए-दिल सुनसान

मगर 'नदीम' की रंगीनी-ए-बयाँ गई