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दिल्ली (कविता) - रामधारी सिंह "दिनकर"

यह कैसी चांदनी अम के मलिन तमिस्र गगन में कूक रही क्यों नियति व्यंग से इस गोधूलि-लगन में ? मरघट में तू साज रही दिल्ली कैसे श्रृंगार? यह बहार का स्वांग अरी इस उजड़े चमन में! इस उजाड़ निर्जन खंडहर में छिन्न-भिन्न उजड़े इस घर मे तुझे रूप सजाने की सूझी इस सत्यानाश प्रहर मे
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