दिल ने अपनी ज़बाँ का पास किया

आँख ने जाने क्या क़यास किया

क्या कहा बाद-ए-सुब्ह-गाही ने

क्या चराग़ों ने इल्तिमास किया

कुछ अजब तौर ज़िंदगानी की

घर से निकले घर का पास किया

इश्क़ जी जान से किया हम ने

और बे-ख़ौफ़-ओ-बे-हिरास किया

रात आई उधर सितारों ने

शबनमी पैरहन लिबास किया

साया-ए-गुल तो मैं नहीं जिस ने

गुल को देखा गुल को बास किया

बाल तो धूप में सफ़ेद किए

ज़र्द किस छाँव में लिबास किया

क्या तिरा ए'तिबार था तू ने

क्या ग़ज़ब शहर-ए-नासपास किया

क्या बताऊँ सबब उदासी का

बे-सबब मैं उसे उदास किया

ज़िंदगी इक किताब है जिस से

जिस ने जितना भी इक़्तिबास किया

जब भी ज़िक्र-ए-ग़ज़ल छिड़ा उस ने

ज़िक्र मेरा ब-तौर-ए-ख़ास किया